
FMTMPCGCON VII सम्मेलन में अटल मेडिकल कॉलेज, विदिशा के डॉक्टरों ने जीते पुरस्कार
विदिशा: न्याय केवल बयान और गवाहों तक सीमित नहीं है, बल्कि उसकी असली बुनियाद वैज्ञानिक फॉरेंसिक Investigation पर टिकी होती है। इस तथ्य को अटल बिहारी वाजपेयी शासकीय चिकित्सा महाविद्यालय, विदिशा के फॉरेंसिक मेडिसिन एवं टॉक्सिकोलॉजी विभाग ने मध्यप्रदेश–छत्तीसगढ़ स्तर पर आयोजित FMTMPCGCON VII राज्य स्तरीय सम्मेलन में प्रभावशाली ढंग से सिद्ध किया।
सम्मेलन में विभाग के चिकित्सकों द्वारा प्रस्तुत शोध पत्रों और केस स्टडी को विशेषज्ञों ने सराहा, वहीं उत्कृष्ट प्रदर्शन के लिए विभाग को कई पुरस्कारों से सम्मानित किया गया।
इन सभी शोध कार्यों का संपादन एवं मार्गदर्शन महाविद्यालय के अधिष्ठाता डॉ. मनीष निगम, विभागाध्यक्ष डॉ. नरेंद्र सिंह पटेल एवं सहायक प्राध्यापक डॉ. विवेक कुमार चौकसे द्वारा किया गया।
आत्महत्या नहीं, Investigation में सुनियोजित हत्या निकली
सम्मेलन में डॉ. सावन वर्मा द्वारा प्रस्तुत एक फॉरेंसिक केस स्टडी विशेष चर्चा का विषय रही। विदिशा के जंगल में पेड़ से लटके सड़े-गले शव को प्रारंभिक Investigation में आत्महत्या माना गया था, लेकिन सूक्ष्म पोस्टमार्टम परीक्षण में रस्सी पर पाए गए असामान्य घर्षण चिह्नों और घटनास्थल से मिले वैज्ञानिक साक्ष्यों ने पूरे मामले की दिशा बदल दी।
फॉरेंसिक निष्कर्षों के आधार पर पुलिस जांच में सामने आया कि मृतक को उसके तीन साथियों ने शराब के नशे में जीवित अवस्था में फांसी पर लटकाया था। इस सशक्त प्रस्तुति के लिए डॉ. सावन वर्मा को “बेस्ट पेपर अवॉर्ड” प्रदान किया गया।
मातृ मृत्यु में सिस्टम की लापरवाही उजागर
वहीं डॉ. वैभव अग्रवाल द्वारा प्रस्तुत मातृ मृत्यु पर आधारित केस सीरीज़ को सर्वश्रेष्ठ शोध पत्र पुरस्कार से सम्मानित किया गया। इस शोध में स्पष्ट रूप से सामने आया कि समय पर इलाज न मिलना और स्वास्थ्य प्रणाली की लापरवाही कई मातृ मौतों का प्रमुख कारण बनती है।
मारपीट नहीं, ज़हर से हुई थी मौत
इसके अलावा डॉ. अमर सिंह मांझी की पोस्टर प्रस्तुति में एक ऐसा मामला उजागर हुआ, जिसे प्रारंभ में मारपीट से हुई हत्या बताया जा रहा था। लेकिन गहन फॉरेंसिक एवं टॉक्सिकोलॉजिकल Investigation के बाद मृत्यु का वास्तविक कारण विषाक्तता (Poisoning) पाया गया और मामला आत्महत्या सिद्ध हुआ।
पोस्टमार्टम नहीं, न्याय की रीढ़
इन उपलब्धियों ने एक बार फिर साबित कर दिया कि
“पोस्टमार्टम कोई औपचारिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि न्याय की रीढ़ है।”
फॉरेंसिक विज्ञान ही वह अंतिम कड़ी है, जो सच और भ्रम के बीच की रेखा खींचती है।